नेपाल में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुए ‘जेन-Z’ आंदोलन ने सरकार को खदेड़ दिया है। संसद भवन के साथ पीएम, राष्ट्रपति और गृहमंत्री के आवास में तोड़फोड़ और आगजनी हुई। पीएम केपी ओली इस्तीफा देकर हेलिकॉप्टर से भागते दिखे।
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इस सीन ने पिछले साल बांग्लादेश में हुए तख्तापलट की याद दिला दी। जब शेख हसीना को हेलिकॉप्टर से भागना पड़ा था। उससे पहले श्रीलंका में भी ऐसे ही तख्तापलट हुआ था।
नेपाल में ये सब क्यों हो रहा, आगे क्या होगा और भारत के पड़ोसी देशों में एक पैटर्न पर कैसे हो रहे तख्तापलट; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: नेपाल में सोशल मीडिया बैन के विरोध में भड़की चिंगारी ने सरकार को कैसे घुटनों पर ला दिया?
जवाबः 4 सितंबर को नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने का आदेश दिया। इसके बाद हामी नेपाल नाम का NGO चलाने वाले सुदान गुरंग ने इंस्टाग्राम पर युवाओं से स्कूल यूनिफॉर्म और स्कूली बैग लेकर सड़क पर उतरने को कहा। 8 सितंबर को नेपाल की संसद के सामने प्रोटेस्ट शुरू हुआ।
संसद के अंदर घुसने की कोशिश करते प्रदर्शनकारी।
ये सिर्फ सोशल मीडिया बैन के खिलाफ नहीं था। हामी नेपाल ने इसका आवाहन करते हुए पोस्ट में लिखा,
एक लंबे अरसे से करप्शन ने हमारे सपने, हमारा फ्यूचर और देश की गरिमा को खत्म किया है। हम देख रहे हैं कि नेता अमीर होते जा रहे हैं और आम लोगों को जीने के लिए तक संघर्ष करना पड़ रहा है, लेकिन अब और नहीं।

केपी ओली सरकार ने प्रोटेस्ट दबाने के लिए गोली चलवा दी, जिसमें अब तक 22 लोग मारे गए, जबकि 400 से ज्यादा घायल हो गए। बच्चों पर गोली चलवाने की खबर फैलते ही आंदोलन बेहद हिंसक हो गया।
प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन में आग लगा दी। पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा को घर में घुसकर पीटा। वित्त मंत्री विष्णु पोडौल को काठमांडू में उनके घर के नजदीक दौड़ा-दौड़ाकर पीटा।

प्रदर्शनकारियों ने मंगलवार को वित्त मंत्री विष्णु पौडेल को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। उनके सीने पर लात मारी। (वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।)
प्रदर्शनकारियों ने पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड, शेर बहादुर देउबा और संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग के निजी आवासों को भी आग के हवाले कर दिया।
प्रधानमंत्री केपी ओली के अलावा सरकार में शामिल 4 मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो सुशांत सरीन बताते हैं…
- 1990 के दशक से ही नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल रही। पहले राजशाही, फिर संवैधानिक राजशाही आई और फिर लोकतांत्रिक सरकार आई, लेकिन नेपाल में करप्शन कभी खत्म नहीं हुआ।
- जनता के बीच समर्थन खो चुके 75 से 80 साल के लोग सरकारें चलाते आ रहे हैं। टॉप पदों पर कोई युवा नेता नहीं हैं। ऐसे में सोशल मीडिया बैन के मुद्दे ने एक चिंगारी का काम किया।
- नेपाल में यूथ कल्चर और यूथ मीडिया का स्ट्रक्चर बहुत वाइब्रेंट है। रेडियो स्टेशन हैं, कम्युनिटीज हैं। लोग सड़कों पर आना जानते हैं। इस बार प्रोटेस्ट में कट्टर माओवादी, कम उम्र के नेताओं की पार्टियों और हिंदू राष्ट्रवादी लोग जुड़ गए।
सवाल-2: नेपाल में हिंसक प्रदर्शन और पीएम के इस्तीफे के बाद अब आगे क्या होगा?
जवाबः नेपाल में संसद के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा में 275 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 138 है।
- नवंबर 2022 में हुए आम चुनाव में शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस (NC) को सबसे ज्यादा 88 सीटें और केपी शर्मा ओली की ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल- यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट’ यानी CPN (UML) को 79 सीटें मिलीं।
- जबकि पुष्प कमल दहल (प्रचंड) की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) यानी CPN-MC को 32 सीटें मिलीं।
- CPN (UML) और NC ने समर्थन देकर प्रचंड को पीएम बनाया, लेकिन जुलाई 2024 में समर्थन वापस लेकर NC के साथ गठबंधन की नई सरकार में ओली चौथी बार नेपाल के पीएम बने। कुछ छोटे दल जैसे जनता समाजवादी पार्टी (JSP) ने भी ओली की सरकार को समर्थन दिया था।
- मौजूदा समय में संसद में 32 सीटों के साथ प्रचंड की पार्टी CPN-MC, 20 सीटों के साथ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) और 14 सीटों वाली राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी (RPP) और 12 सीटों वाली पीपुल्स सोशलिस्ट पार्टी (PSP) विपक्ष में हैं।
विपक्षी पार्टी RSP के लीडर 50 साल के रवि लामिछाने हैं। टीवी एंकर के बतौर करियर शुरू करने के बाद वह 2022 में सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर युवाओं के बीच लोकप्रिय रवि ने इस प्रोटेस्ट को अपना समर्थन दिया है।

विपक्षी पार्टी RSP के लीडर 50 साल के रवि लामिछाने हैं। (फाइल फोटो)
काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह (बालेन शाह) की उम्र 35 साल हैं। वह नेपाली रैपर और सिंगर रहे हैं। वो भी इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।
RPP के नेता राजेंद्र लिंगदेन और कमल थापा और PSP के लीडर उपेंद्र यादव भी सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसके अलावा माओवादी गुरिल्ला नेता कहे जाने वाले दुर्गा प्रसाई नेपाल को राजशाही के तहत लाने के लिए आंदोलन करते रहे हैं।
नेपाल में प्रदर्शनकारी सिर्फ सरकार के नेताओं या केपी ओली के समर्थकों के खिलाफ प्रदर्शन नहीं कर रहे, बल्कि सभी पुराने नेताओं को टारगेट कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड और नेपाल के राष्ट्रपति के घर पर भी हमला और आगजनी की गई है।

राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के निवास (शीतल भवन) में प्रदर्शनकारियों ने मंगलवार को आग लगा दी।
सुशांत सरीन कहते हैं, ‘इससे पहले जब एक सरकार के खिलाफ विरोध का माहौल बनता था, तो दूसरे नेता आगे आ जाते थे और देश में चुनाव करवाकर केपी ओली, शेर बहादुर देउबा और प्रचंड के बीच सरकार का ट्रांसफर होता रहता था। इस बार गुस्सा इन सभी सीनियर नेताओं को लेकर है। इनमें से कोई भी जनता को भरोसे में नहीं ले पा रहा। ऐसे में अभी यह नहीं कहा जा सकता कि आगे नेपाल की सत्ता कौन चलाएगा। क्या फौज काबिज होगी, कोई अंतरिम सरकार बनेगी या दोबारा चुनाव होंगे, अभी इस पर कुछ भी कह पाना मुश्किल है।’
विदेश मामलों के जानकार प्रोफेसर प्रसेनजीत बिश्वास कहते हैं कि केपी ओली के जाने के बाद नेपाल में एक अंतरिम सरकार बनेगी, इसमें रबि लामिछाने जैसे नेता बड़ी भूमिका में होंगे। सिंगर से नेता बालेन शाह को नेपाल की सबसे बड़ी त्रिभुवन यूनिवर्सिटी का प्रभाव रहेगा, अमेरिकन लॉबी के सपोर्ट वाले कुछ लोग सरकार का हिस्सा बन सकते हैं।
सवाल-3: पिछले साल बांग्लादेश में इसी पैटर्न पर कैसे हुआ था तख्तापलट?
जवाब: 2024 में बांग्लादेश में छात्रों ने आंदोलन शुरू किया, जिसे ‘जुलाई क्रांति’ या ‘जेन-Z क्रांति’ के रूप में जाना गया। इस आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट कर दिया और एक अंतरिम सरकार बनी, जिसे एक्सपर्ट्स ने ‘साइलेंट मिलिट्री कूप’ कहा।
यह आंदोलन सरकारी नौकरियों में कोटा सुधार की मांग को लेकर था, लेकिन यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आंदोलन में बदल गया…
5 जून 2024: बांग्लादेश हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में 30% कोटा प्रणाली को फिर से लागू करने का आदेश दिया, जो 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के पोते-पोतियों को शामिल किया गया। छात्रों और नौकरी चाहने वालों ने विरोध किया, क्योंकि इसे पक्षपातपूर्ण और मेरिट-बेस्ड भर्ती के खिलाफ माना गया।

छात्रों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
1 जुलाई 2024: ढाका यूनिवर्सिटी और अन्य एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स के छात्रों ने स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन यानी SAD के बैनर तले देशभर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किए। बांग्लादेश में बेरोजगारी दर 2024 में 12% से ज्यादा थी और युवा आर्थिक संकट से जूझ रहे थे।

शेख हसीना ने कहा, ‘प्रदर्शनकारी छात्र नहीं, बल्कि देश को अस्थिर करने वाले आतंकवादी हैं।’ (फाइल फोटो)
20 जुलाई 2024: पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस रबर की गोलियां और लाठीचार्ज किया। बांग्लादेश की रैपिड एक्शन बटालियन यानी RAB और प्रदर्शनकारियों की झड़प हुई, जिसमें 560 लोगों की मौत हुई और 2 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। सरकार ने स्कूल-यूनिवर्सिटी बंद कर दी, कर्फ्यू लागू किया, इंटरनेट और टेलीकम्युनिकेशन सर्विस बंद कर दी।
4 अगस्त 2024: हिंसा चरम पर पहुंची और ढाका में 95 लोग और मारे गए, जिनमें 14 पुलिसकर्मी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशनों, अवामी लीग के ऑफिस और सरकारी भवनों पर हमला किया। शेख हसीना को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।

प्रदर्शनकारियों ने पीएम आवास पर कब्जा कर लिया था।
5 अगस्त 2024: शेख हसीना ने पीएम पद से इस्तीफा दिया और भारत भाग गईं। सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमां ने अंतरिम सरकार बनाने का ऐलान करते हुए कहा,
प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया है, और एक अंतरिम सरकार देश को चलाएगी।

6 अगस्त 2024: अंतरिम सरकार में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया और अंतरिम सरकार बनना शुरू हुई। राष्ट्रपति मोहम्मद शाहबुद्दीन ने संसद भंग कर दी और विपक्षी नेता खालिदा जिया को रिहा कर दिया गया।
शेख हसीना का इस्तीफा और भारत में शरण लेना सैन्य दबाव की वजह से हुआ। सेना प्रमुख वाकर-उज-जमां ने उनकी विदाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंतरिम सरकार की स्थापना की। हालांकि, हिंसा और अराजकता जारी रही। हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले, लूटपाट और तोड़फोड़ की घटनाएं बढ़ीं। अवामी लीग के कार्यालयों और नेताओं के घरों पर हमले हुए।

प्रदर्शनकारी सिराजगंज में इनायतगंज पुलिस स्टेशन में घुस गए और वहां कई पुलिसकर्मियों को मार डाला। (फाइल इमेज)
सवाल-4: श्रीलंका में भी आम लोगों के आंदोलन ने तख्तापलट कैसे किया?
जवाब: 2022 में श्रीलंका में हुए आम लोगों के आंदोलन को ‘अरागलया’ कहा गया, जिसने राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और उनके परिवार की सत्ता का तख्ता पलट दिया। दरअसल, श्रीलंका अपनी आजादी के बाद से सबसे गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। राजपक्षे परिवार, राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और उनके भाई प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने बडे़ पैमाने पर विदेशी कर्ज किया, जिसका इस्तेमाल आलीशान इमारतें बनाने और भ्रष्टाचार में हुआ।
2019 से 2022 के बीच बड़ी टैक्स कटौती, रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध और कोविड-19 की वजह से टूरिज्म इनकम कम हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से तेल की कीमतें बढ़ीं और विदेशी मुद्रा भंडार शून्य हो गया। अप्रैल 2022 में श्रीलंका ने 50 बिलियन डॉलर से ज्यादा के विदेशी कर्ज पर डिफॉल्ट की घोषणा की।

यूनाइटेड नेशन्स यानी UN ने अनुमान लगाया कि 28% आबादी यानी करीब 63 लाख लोग खाने की कमी से जूझ रहे थे। नतीजतन, देशभर में तेल, भोजन और दवाओं की कमी हुई। 13 घंटे तक बिजली कटौती होने लगी और 34% मुद्रास्फीति ने आम लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया…
31 मार्च 2022: श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में गोटाबाया राजपक्षे के निजी आवास के बाहर पहला बड़ा प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने #GoHomeGota और #GoHomeRajapaksas के नारे लगाए, जिसमें राष्ट्रपति और उनके परिवार से इस्तीफे की मांग की गई। प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए।

श्रीलंकाई पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े।
4 अप्रैल 2022: टंगाल्ले में राजपक्षे परिवार के निवास (कार्लटन हाउस) के पास प्रदर्शन हुए। सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड कैब्राल ने इस्तीफा दे दिया। गोटबाया राजपक्षे ने कहा, ‘मैं विपक्ष को एकता सरकार में शामिल होने के लिए आमंत्रित करता हूं ताकि संकट का समाधान हो सके।’ लेकिन विपक्ष ने इसे खारिज कर दिया।
9 अप्रैल 2022: कोलंबो के गाले फेस ग्रीन में ‘गोटागोगामा’ नाम से प्रदर्शन की जगह बनाई गई। यह आंदोलन का केंद्र बना। इसमें सिंहली, तमिल और मुस्लिम समेत सभी लोग शामिल थे। सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया।

2022 में लोगों की यह भीड़ श्रीलंका के कई शहरों से कोलंबो पहुंची थी।
9 मई 2022: महिंदा राजपक्षे के समर्थकों ने गाले फेस ग्रीन में प्रदर्शनकारियों पर हमला किया, जिससे देशव्यापी हिंसा भड़क उठी। 8 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हुए। महिंदा राजपक्षे ने पीएम पद से इस्तीफा दिया। प्रदर्शनकारी नेता मेलानी गुनाथिलके ने कहा, ‘महिंदा का इस्तीफा एक कदम है, लेकिन हमें पूरी राजपक्षे व्यवस्था को हटाना है।’
12 मई 2022: रानिल विक्रमसिंघे को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति विवादास्पद थी, क्योंकि विक्रमसिंघे को राजपक्षे परिवार का समर्थक माना जाता था। प्रदर्शनकारियों ने विक्रमसिंघे के खिलाफ नारे लगाए और उन्हें ‘राजपक्षे का कठपुतली’ कहकर खारिज किया।

प्रदर्शनकारियों ने विक्रमसिंघे के खिलाफ नारे लगाए।
9 जुलाई 2022: हजारों प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर धावा बोला। गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर मालदीव भाग गए। प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन में घुस गए। उन्होंने वहां स्विमिंग पूल में तैरना, बिस्तर पर लेटना और रसोई में खाना बनाना शुरू किया, जो आंदोलन की जीत का प्रतीक बन गया।

राष्ट्रपति भवन के स्वीमिंग पूल में तैरते प्रदर्शनकारी।
13 जुलाई 2022: गोटाबाया राजपक्षे ने रानिल विक्रमसिंघे को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया। सैन्य और पुलिस ने गाले फेस ग्रीन के प्रदर्शन स्थल पर छापा मारा, जिसमें 50 से अधिक लोग घायल हुए और 9 गिरफ्तार किए गए। कई पत्रकारों पर हमला हुआ।
14 जुलाई 2022: गोटाबाया राजपक्षे ने सिंगापुर से ई-मेल के जरिए इस्तीफा दे दिया। यह श्रीलंका के इतिहास में पहली बार था जब किसी मौजूदा राष्ट्रपति ने इस्तीफा दिया।
20 जुलाई 2022: संसद ने विक्रमसिंघे को नया राष्ट्रपति चुना, जो राजपक्षे की श्रीलंका पोदुजना पेपेमुना यानी SLPP पार्टी के समर्थन से मुमकिन हुआ। प्रदर्शनकारियों ने नई संसदीय चुनावों और कार्यकारी राष्ट्रपति प्रणाली खत्म करने की मांग की।
हालांकि, अगस्त तक प्रदर्शन कमजोर पड़ गए। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड यानी IMF और विक्रमसिंघे की सख्त नीतियों ने आंदोलन को दबा दिया। गोटाबाया राजपक्षे 50 दिन बाद सिंगापुर और थाईलैंड के रास्ते श्रीलंका लौट आए, लेकिन उनकी राजनीतिक वापसी नहीं हुई। 21 सितंबर को राष्ट्रीय जन शक्ति यानी NPP नेता अनुरा कुमारा दिसानायके को राष्ट्रपति चुना गया।

यह श्रीलंका की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा बदलाव था, क्योंकि दिसानायके गठबंधन सरकार के राष्ट्रपति बने।
सवाल-5: नेपाल, बांग्लादेश जैसे देशों में स्टूडेंट मूवमेंट से तख्तापलट तक का पैटर्न कैसे काम करता है?
जवाब: सुशांत सरीन कहते हैं, नई पीढ़ी गवर्नेंस का पुराना घिसा-पिटा ढर्रा नहीं चाहती, जबकि नेता युवाओं के हित की पॉलिसी लाने के बजाय खुद को मजबूत करने में लगे रहते हैं। जब बरसों तक युवाओं में गुस्सा पलता रहता है, तो इसे सिर्फ एक चिंगारी की जरूरत होती है।
बांग्लादेश की हाईकोर्ट ने नौकरियों में 30% कोटा लागू करने का आदेश दिया, इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद ही थमा। श्रीलंका में भी नेताओं के करप्शन के चलते जब बिजली की कमी और महंगाई हद से ज्यादा हो गई तो लोग सड़कों पर आने को मजबूर हो गए। इसी तरह नेपाल में भी असली वजह नेताओं का करप्शन थी। सोशल मीडिया बैन के आदेश ने इसमें चिंगारी का काम किया। भारत को भी इससे सीख लेनी चाहिए।’
JNU के प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार राजन कुमार कहते हैं, ‘श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में बेरोजगारी, महंगाई, नौकरी जैसे मुद्दे हैं। नेपाल में कोई इंडस्ट्री ही नहीं है। इन देशों के युवा जब पश्चिमी देशों के युवाओं से अपनी तुलना करते हैं, तो उनमें गुस्सा पनपता है। सभी जगह सरकारें कमजोर हैं, साथ ही विदेशी ताकतें भी प्रोटेस्ट में पीछे से मदद करने लगती हैं। इससे तख्तापलट जैसी नौबत आ जाती है।’
राजन कुमार के मुताबिक, ‘भारत में भी यूथ सरकारों से नाराज होता है, लेकिन उसके पास पॉलिटिकल स्पेस है। वह वोट देकर विपक्षी दलों को सरकार में ला सकता है। जबकि इन देशों में विपक्ष लगभग जीरो है। नेपाल में तो विपक्षी नेताओं एक साथ मिलकर साझा सरकार चला रहे थे।’
सवाल-4: क्या भारत के पड़ोसी देशों के तख्तापलट में विदेशी ताकतों का भी हाथ हो सकता है?
जवाब: जियोपॉलिटिक्स पर करीबी नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स इन तख्तापलट में विदेशी ताकतों के शामिल होने से इनकार नहीं करते।
चीन के करीबी और भारत के विरोधी माने जाने वाले नेपाल के केपी ओली SCO समिट में शामिल होने के लिए चीन गए थे। 5 ही दिन बाद यानी 4 सितंबर को ओली ने फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे 26 अमेरिका बेस्ड सोशल मीडिया कंपनियों पर बैन का ऐलान कर दिया।
नेपाल सरकार का कहना था कि इन कंपनियों ने रजिस्ट्रेशन की शर्तें नहीं पूरी कीं। जबकि टिकटॉक जैसी कई चीनी एप्स पर कोई बैन नहीं लगाया गया। कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि ओली ने चीन के समर्थन में अमेरिका का विरोध करने के लिए इन कंपनियों पर बैन लगाया। जब नेपाल के युवा इस बैन के विरोध में खड़े हुए, तो इसे अमेरिकी लॉबी से सपोर्ट मिला।
नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और साउथ एशिया की राजनीति के जानकार प्रसेनजीत बिश्वास का कहना है कि नेपाल में प्रोटेस्ट की शुरुआत से ही इसमें अमेरिका का सीधा हाथ है। अमेरिका, नेपाल पर चीन का प्रभाव खत्म करना चाहता है।

अमेरिका की सरकार में शामिल लोगों ने नेपाल के यूथ लीडर्स के साथ मिलकर इस प्रोटेस्ट का स्ट्रक्चर तैयार किया।
वहां मौजूद नेपाली संघ और अमेरिका नेपाल हेल्पिंग सोसाइटी जैसे ऑर्गेनाइजेशन और अमेरिका की सरकार में शामिल लोगों ने नेपाल के यूथ लीडर्स के साथ मिलकर इस प्रोटेस्ट का स्ट्रक्चर तैयार किया, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों को आगे रखा गया, बाद में रबि लामिछाने जैसे नेता इसमें शामिल हो गए।
हालांकि सुशांत सरीन नेपाल की राजनीतिक उथल-पुथल में अमेरिका के हाथ को सिर्फ अटकल बताते हैं। वह कहते हैं, ‘श्रीलंका और बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन के पीछे भी विदेशी ताकतों का हाथ बताया गया। शेख हसीना ने खुद कहा था कि अमेरिका उनसे एक टापू मांग रहा था, उनके इनकार करने के बाद अमेरिका ने दबाव बनाना शुरू कर दिया। नेपाल के मामले में भी यही कहा जा रहा है। हालांकि ये सिर्फ अटकलें हैं, असली वजह उन देशों में फैला करप्शन और जनता का असंतोष ही है। अगर किसी बाहरी ताकत ने दखल दिया भी है, तो उसका मौका खुद सरकार ने ही दिया है।’
सवाल-5: नेपाल के आंदोलन से भारत पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: केपी ओली भारत के समर्थक नहीं थे। लेकिन ऐसा भी नहीं कह सकते कि उनके जाने के बाद वहां की नई लीडरशिप का झुकाव भारत की तरफ होगा। मौजूदा हाल में नेपाल में कोई भी नेता ऐसा नहीं दिखता, जिसके नाम पर सभी पार्टियां और आंदोलन कर रहे आमलोग एकजुट हो जाएंगे। नई सरकार बनने के बाद ही इसका असर भारत पर दिखेगा।

नेपाल में बढ़ते विरोध प्रदर्शन को देखते हुए भारत सरकार ने भारत-नेपाल सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी गई है।
प्रसेनजीत बिस्वास कहते हैं, ‘नेपाल में कुछ युवा नेताओं की लीडरशिप में बनने जा रही अंतरिम सरकार से भारत के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी। क्योंकि सरकार में अमेरिकन लॉबी वाले लोग हैं। भारत से नेपाल का सीमा विवाद और गहरा हो सकता है।’
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नेपाल में सोमवार को काठमांडू और कई बड़े शहरों में सरकार के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन जारी है। इसमें अब तक 19 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, 200 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…
