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इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज को हाईकोर्ट से राहत: कलेक्टर के आदेश पर रोक, छह सप्ताह बाद होगी सुनवाई – Indore News

इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज को हाईकोर्ट से राहत:  कलेक्टर के आदेश पर रोक, छह सप्ताह बाद होगी सुनवाई – Indore News

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की एकलपीठ ने कलेक्टर द्वारा पारित आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। कॉलेज की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया कि कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया है। याचिकाकर्ता के अनुसार कॉलेज मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 181 और 182 के तहत ‘भूमिस्वामी’ नहीं है, इसके बावजूद कलेक्टर ने कार्यवाही कर आदेश जारी कर दिया, जो कानूनन गलत है। आदेश की तारीख को लेकर भी विवाद हाईकोर्ट के समक्ष यह भी तथ्य सामने आया कि कलेक्टर के समक्ष मामला 23 जनवरी 2026 को अंतिम आदेश के लिए तय था, लेकिन उससे पहले ही 12 जनवरी 2026 को आदेश पारित कर दिया गया। वहीं, इसी बीच अतिरिक्त आयुक्त द्वारा 19 जनवरी 2026 को यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश भी दिए जा चुके थे। याचिका में आरोप लगाया गया कि इन आदेशों को निष्प्रभावी करने के लिए कलेक्टर का आदेश एंटी-डेटेड हो सकता है। वैकल्पिक अपील की दलील खारिज राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक अपील का उपाय उपलब्ध है, लेकिन कोर्ट ने माना कि मामला अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से जुड़ा हुआ है, ऐसे में याचिकाकर्ता को वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अगली सुनवाई तक आदेश पर रोक हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के पक्ष में मामला बनता पाया और निर्देश दिए कि कलेक्टर का 12 जनवरी 2026 का आदेश अगली सुनवाई तक प्रभावी नहीं रहेगा। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत कॉलेज प्रबंधन ने कलेक्टर की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस को पहले हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि कलेक्टर का पत्र केवल नोटिस है, अंतिम आदेश नहीं। प्रबंधन को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा। इसके बाद प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां याचिका खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि कलेक्टर कानून के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह तय हो गया था कि अंतिम फैसला कलेक्टर ही लेंगे।



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