असगर नकी | सुलतानपुर6 मिनट पहले
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“घटना के दिन सर बाइक से आए थे। सर बहुत अच्छे थे, हम लोगों को पेन्सिल-रबड़ ये सब स्वयं देते थे। हम लोगों को कभी डराए भी नहीं। ये कहना है अमरूपुर के सरकारी स्कूल के बच्चों का। जहां के शिक्षक अब्दुल रशीद पर एक बच्ची के अगवा करने का आरोप लगा है।”
जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी वाराणसी मार्ग चांदा कोतवाली है, और यहां से लगभग 5 किमी दूर मिडिल स्कूल है। जहां पर अब्दुल रशीद की तैनाती थी। अब्दुल रशीद की नियुक्ति नईगंज धौरहरा स्कूल पर हुई थी। जुलाई में स्कूल मर्ज हुआ तो 9 जुलाई को अमरूपुर में उन्हें शिफ्ट किया गया।
27 जनवरी की शाम उन पर तीसरी कक्षा की सात वर्ष की छात्रा ने जो आरोप लगाया उन्होंने इसकी कल्पना सपने में भी नहीं की थी। छात्रा ने आरोप लगाया कि स्कूल से निकलने के बाद सर ने उसे सफेद कलर की कार में बैठा लिया जहां दो लोग और साथ थे। उसके बाद मुंह बांधकर हमें जंगल की ओर ले गए और गाड़ी में रखे चाकू को दिखाकर कहा अगर किसी को कुछ बताया तो गला काट दूंगा। फिर दो घंटे बाद शाम 5 बजे घर से पहले बाजार में मस्जिद के पास उतार कर वो चले गए। परिजनों ने बच्ची की बात को सत्य माना और बिना पड़ताल किए हिंदूवादी संगठन को इसकी सूचना दिया। दूसरे दिन हिंदू संगठन के सैकड़ों लोगों ने थाना घेर लिया और पुलिस पर कार्रवाई का दबाव बनाया। उच्च अधिकारी नतमस्तक हो गए, या ये कहे कि कानून व्यवस्था पिछले कुछ समय से ऐसे संगठनो के इर्द गिर्द ही घूम कर रह गई है। अंत में बिना जांच किए शिक्षक पर अपहरण का केस दर्ज हुआ और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

दैनिक भास्कर ने ग्राउंड जीरो पर इसके पीछे की सच्चाई जानने का प्रयास किया। आखिर शिक्षक ने छात्रा का अपहरण क्यों किया? क्या वो पूर्व से ऐसे चरित्र का था? किसी और छात्रा के साथ या क्षेत्र में भी क्या ऐसी घटना को वो अंजाम दे चुका है? या फिर उसकी धार्मिक वेशभूषा उसके विरुद्ध हुई कार्रवाई का कारण बना? इन सवालों का जवाब तलाशने हम सबसे पहले शिक्षक अब्दुल रशीद के घर पहुंचे। चांदा बाजार में स्टेट बैंक के सामने चार फिट की गली में उसका एक मंजिला पुराना बना हुआ मकान है। जहां मोहल्ले के बच्चों से हमने पूछा की उनका स्वभाव कैसा था जवाब मिला वे हमें भी पढ़ाते लेकिन कभी हमारे साथ गलत नहीं किया। कई एक महिलाएं भी मिली, उन्होंने पर्दे की बात कहते हुए कैमरे पर आने से मना किया। लेकिन ये जरूर कहा मौलवी साहब ऐसे थे नहीं बस उन्हें मुसलमान होने की सजा मिली। यहां कई एक लोग भी मिले उन्होंने ने भी ऑफ दा कैमरा कहा ये वैसे ही हुआ जैसे अयोध्या में सपा नेता पर न जाने क्या क्या आरोप सरकार और मीडिया ने लगा डाला और फैसला आया तो आरोप लगाने वालों के ही मुंह पर कालिख पुत गई। यही यहां पर भी होगा।
यहां पर हमारी मुलाक़ात शिक्षक अब्दुल रशीद के छोटे भाई शहजादे अहमद, किसी की साजिश है और साजिश कौन कर रहा है ये पता नहीं चल रहा है। लेकिन भईया हमें बताए थे कि हमारे पास एक फोन आया था राम केवल शुक्ला। उन्होंने पूछा मास्टर साहब बोल रहे हो, कहा हां तो बोले की अमरूपुर पढ़ाते हो तो भाई ने कहा हां। कहने लगे स्कूल छुट्टी के बाद हमारी बच्ची घर नहीं आई। भाई ने कहा कैसे नहीं आई घर, कहा 5 बजे आई शाम को। कहा उससे पूछे थे तो कह रही मौलवी साहब हमको लेकर गए थे घूमा टहला कर लाकर छोड़ दिए हैं।
इस पर भाई ने कहा हमें इसकी जानकारी नहीं है। छुट्टी होने के बाद हम मास्टर साहब को बताकर तहसील चले गए थे। हमारे भाई ने कहा तहसील में हम दस्तावेज लेखक डब्बू सिंह और संतोष यादव के पास दस्तावेज लेने गए थे चाहे तो आप पूछ सकते हैं। इस पर उन्होंने कहा ठीक है मास्टर साहब स्कूल में आए तो समझा जाएगा।
सुबह पहले हम नौ बजे गए तो देखा तो वहां लोग बहुत बड़ा रियूमर बनाए हैं, वहां लोग कह रहे थे मुसलमान होकर ये सबको टहला रहा है। फिर चौकी इंचार्ज आए और हमें लेकर थाने पर गए। थाने पर बजरंग दल आरएसएस वाले आ गए। ये लोग इतना दबाव बनाए कि कोतवाल ने कहा आप लोग थोड़ा दूर रहिए। बाद में कहे भाई को बुलाइए वो भी अपना पक्ष रखखे। जब हम लोग उन्हें लेकर गए तो बैठा लिए फिर क्या पूछताछ किए पता नहीं लेकिन भेज दिए जेल।
शिक्षक अब्दुल रशीद आठ भाई और तीन बहन हैं। उनके दो पुत्र हैं, एक मजदूरी करता है और दूसरा पढ़ाई कर रहा है।
इसके बाद हम अमरूपुर स्कूल पहुंचे। सड़क पर ही स्कूल है, आसपास कई दुकाने हैं, कई एक से हमने यहां कैमरे पर बात करना चाहा लेकिन सबसे स्थानीय होने की बात कहकर कैमरे पर आने से मना कर दिया। एक मेडिकल स्टोर संचालक व एक ठेला लगाने वाले व्यक्ति ने बताया भाई साहब जैसा दिखाया जा रहा है सच्चाई बिल्कुल वैसे नहीं है। यही स्कूल के पास ही एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि छुट्टी के बाद हमने छात्रा क़ो टहलते हुए देखा तो कहा यहां कहां घूम रही हो घर जाओ। लेकिन वो दलित बस्ती में जाकर बैग रखकर खेलती रही। अंत में स्वयं ही घर गई।
उधर घर पहुंचने छात्रा की मां ने देर से आने पर उसकी पिटाई की। जिस पर दादा आदि ने उसे पिटने से बचाया। स्कूल से 500 मीटर दूर ही छात्रा का घर है। हम यहां पर भी पहुंचे, जहां गुरुवार शाम आईओ जांच करने पहुंचे थे। यहां छात्रा के दादा से हमारी मुलाक़ात हुई। उन्होंने हमें बताया कि बच्ची ने आकर बताया, सवा तीन बजे के आसपास ये अकेले घर आ रही थी। रास्ते में मौलवी साहब हमें उठा लिए उनक़ो लेकर कुल तीन आदमी थे। मेरा मुंह बांधकर के चले गए, लेकिन लेकर अकेले ही गए। फिर उसके बाद जंगल में लेकर गए फिर कही आगे ले गए। बोले अगर कुछ बोलती हो तो तुम्हारा गला काट दूंगा। चाकू इसको दिखाए और डराए धमकाए कही किसी क़ो मत बताना। फिर लाकर के उन्होंने मस्जिद के सामने छोड़ दिया। रात क़ो मैंने उनके पास फोन किया वो बोले मैं तो था ही नहीं। हम कहे हमसे सम्पर्क कर लीजिये लेकिन आए नहीं। देर हुई तो इसको ढूंढने गए थे बच्चे लोग हम मार्केट में बैठे थे तो सूचना नहीं मिली घर आए तो सूचना मिली। दरोगा के सामने उतारा तो हमारी नातिन ने कहा यही सर जी हैं। वो शिक्षक छात्रा क़ो पढ़ाते भी नहीं थे।
हमने स्कूल के प्रधानाध्यापक व यहां मौजूद सहायक अध्यापक से भी बातचीत की। सहायक अध्यापक ने कहा कि हमारे साथ वो 2018 से काम कर रहे हैं कभी हमने किसी बच्चे के साथ गलत व्यवहार करते हमने नहीं देखा। हां वो बच्चों के प्रति नरम थे, बच्चे स्कूल आए इसके लिए रबड़, कटर, कॉपी पेंसिल वे स्वयं अपने पास से मंगा कर दे देते थे। वही प्रधानाध्यापक ने बताया लगभग छह माह से वे इस स्कूल में हैं आजतक कोई ऐसी शिकायत किसी बच्चे की ओर से नहीं मिली। वरना हम पहले ही उन पर सख्त हो जाते। वही हमने ग्राम प्रधान दिनेश यादव से भी बात किया उन्होंने कहा भाई मामला संदिग्ध लग रहा है ऐसी कोई घटना क्षेत्र में होती तो पहले ही गांव में हल्ला गुहार होती।

हमने दस्तावेज लेखक डब्बू सिंह से भी बात किया। उन्होंने कैमरे पर आने से मना किया। हमें बताया कि सही समय तो हम नहीं बता सकते लेकिन सवा तीन से साढ़े तीन बजे के बीच मौलवी साहब हमारे पास आए थे। उनके दो दस्तावेज हमारे पास थे, एक बैनामा उन्होंने अपनी मां के नाम और एक अपने नाम लिया था उसी का पेपर मांग रहे थे हम काम में व्यस्त थे। हमने कहा थोड़ा समय लगेगा तो वो दूसरे दस्तावेज लेखक के तखते पर कागजात लेने गए। थोड़े समय बाद आए तो हमने पेपर दिया चाय पीने क़ो बोला तो मना कर दिया। शाम करीब 5 से सवा पांच के बीच हम लोग साथ ही तहसील के बाहर निकले। गेट के बाहर बाइक पर बैठे बैठे उन्होंने बात किया फिर वे अपने घर निकल गए और हम अपने घर।
इस पूरे मामले में कई सवाल हैं। पहला ये कि आरोपी कोई पेशेवर अपराधी या बदमाश नहीं था बल्कि एक शिक्षक था। उसका पक्ष जानने के बाद प्राथमिकता पर मोबाइल सीडीआर का रिकॉर्ड क्यों चेक नहीं किया गया? दूसरा उससे अहम पहलू ये कि छात्रा के घर वालों ने उसे अमरूपुर की मस्जिद के पास छोड़कर जाने की बात कही है। मस्जिद के ठीक दूसरी पटरी पर एसबीआई बैंक की शाखा है, वहां के सीसीटीवी फुटेज एविडेंस के लिए क्यों नहीं खंगाले गए। वही शिक्षक के तहसील जाने की बात सामने आने पर लंभुआ तहसील के सामने ही बैंक हैं वहां के सीसीटीवी की जांच क्यों नहीं कराई गई। इसके अलावा स्कूल और शिक्षक के घर के रास्ते में जगह जगह लगे कैमरो की पड़ताल क्यों नहीं हुई? इससे साफ है अधिकारी अब संगठनो के दबाव में ही कार्य कर अपनी कुर्सी बचाना चाह रहे हैं।
इस संदर्भ में एएसपी अखंड प्रताप सिंह ने बताया कि परिजनों का आरोप है स्कूल में छुट्टी के बाद शिक्षक गाड़ी में बैठाकर कही ले गया था। फिर कुछ देर बाद वो उसको छोड़ भी गया। परिजनों से जो तहरीर मिली थी उस पर सुसंगत धाराओ में अभियोग पंजीकृत करके शिक्षक क़ो गिरफ्तार किया गया। उसे जेल भेजा गया है। इसमें विवेचना प्रचलित है जो भी तथ्य सामने आएगा उस पर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।
वही इस प्रकरण में बीएसए उपेंद्र गुप्ता ने बताया कि ये सम्पूर्ण मामला पीपी कमैचा ब्लॉक के थाना चांदा क्षेत्र में घटित हुआ है। इसमें एक कक्षा तीन की छात्रा को 27 तारीख को एक अध्यापक राशिद के द्वारा प्राथमिक विद्यालय अमरुपुर द्वारा बिना जिम्मेदार अधिकारी के अनुमति और बिना अभिभावक की सहमति के वो उसको ले गए। ये कृत्य सरकारी आचार नियमावली के विरुद्ध था। इसके उल्लंघन पर उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। करौदीकला खंड शिक्षा अधिकारी को मामले की जांच दी गई है जो रिपोर्ट आएगी उसके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
