प्रतापगढ़ शहर सहित पूरे जिले में दशामाता का पर्व मनाया जा रहा है। शुभ मुहूर्त में महिलाएं पीपल के पेड़ की पूजा-अर्चना कर रही हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दशामाता को मां पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। दशामाता का व्रत घर-परिवार की बिगड़ी दशा और प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं पूजा और व्रत के बाद गले में एक विशेष डोरा (पूजा का धागा) धारण करती हैं। इसका उद्देश्य परिवार में सुख-समृद्धि, शांति, सौभाग्य और धन-संपत्ति बनाए रखना है। महिलाएं दशामाता और पीपल की पूजा कर सौभाग्य, ऐश्वर्य, सुख-शांति और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हैं। दशामाता व्रत के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के स्वरूप पीपल पेड़ की पूजा की जाती है। सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत के 10 तार का डोरा बनाती हैं और उसमें 10 गांठें लगाती हैं। इसके बाद वे पीपल पेड़ की परिक्रमा करते हुए उसकी पूजा करती हैं। पूजा संपन्न होने के बाद महिलाएं पेड़ के नीचे बैठकर नल दमयंती की कथा सुनती हैं। तत्पश्चात, वे परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए डोरा अपने गले में बांधती हैं। घर लौटने पर वे द्वार के दोनों ओर हल्दी-कुमकुम के छापे लगाती हैं। इस दिन व्रत रखा जाता है और केवल एक समय भोजन ग्रहण किया जाता है।
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