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बड़वानी में बैगन ‘माटी के मोल’: लागत भी नहीं निकल रही, किसान फसल पशुओं को खिला रहे – Barwani News

बड़वानी में बैगन ‘माटी के मोल’:  लागत भी नहीं निकल रही, किसान फसल पशुओं को खिला रहे – Barwani News

बड़वानी जिले में बैगन उत्पादक किसान गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। कभी नकदी फसल माने जाने वाले बैगन के दाम इतने गिर गए हैं कि किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। खेतों में खड़ी फसल या तो सड़ रही है, या किसान उसे ट्रैक्टरों में भरकर गौशालाओं में पशुओं को खिलाने भेज रहे हैं। बड़वानी जिले को हरी सब्जियों के उत्पादन का गढ़ माना जाता है। यहां से बैगन, लौकी, खीरा और कद्दू जैसे उत्पाद दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात सहित कई राज्यों में भेजे जाते हैं। हालांकि, पिछले 20 दिनों से बैगन की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे किसानों को बड़ा नुकसान हो रहा है। ग्राम करी के किसान दीपक गेहलोद ने चार एकड़ में बैगन की खेती की थी, जिसमें बंपर फसल हुई। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में प्रति एकड़ 35 से 40 हजार रुपए की लागत आई। इस तरह चार एकड़ में कुल एक लाख पचास हजार रुपए से अधिक का खर्च हुआ, जिसमें खाद, दवा और मजदूरी का खर्च शामिल था। उन्हें 10 से 12 रुपए प्रति किलो का भाव मिलने की उम्मीद थी। दीपक गेहलोद के अनुसार, अब मंडी में व्यापारी एक रुपए प्रति किलो में भी बैगन खरीदने को तैयार नहीं हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि बैगन तोड़ने और उसे मंडी तक ले जाने का किराया-भाड़ा भी नहीं निकल पा रहा है। इस घाटे से बचने के लिए कुछ किसान बैगन को खेत में ही छोड़ रहे हैं, जबकि कुछ उसे पशुओं को खिला रहे हैं। लोकल आवक से गिरे भाव स्थानीय व्यापारी परेश नामदेव का कहना है कि ज्यादातर सौदे खड़ी फसल में ही हो जाते हैं। “हम किसानों को पहले ही भुगतान कर देते हैं। जो किसान पैसा ले चुका, वह माल भेज देता है। मगर आगे डिमांड नहीं है। बाहर की मंडियों में भी लोकल माल की आवक बढ़ने से रेट गिरे हैं।” बंपर पैदावार बनी किसानों के लिए आफत
कृषि विभाग के अधिकारी के सी वास्कले ने बताया कि आंकड़ों के अनुसार इस बार मौसम अनुकूल रहने से बैगन का रकबा और उत्पादन दोनों बढ़े हैं। बड़वानी में अकेले बैगन का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 30 ज्यादा हुआ है। मगर ज्यादा आवक ने ही कीमतों को जमीन पर ला दिया। गौशालाओं का सहारा
खेत में सड़ने से बेहतर समझकर कई किसान अब बैगन को गौशालाओं में भिजवा रहे हैं। बड़वानी की नर्मदा गौशाला के संचालक अजय खंडेलवाल ने बताया कि पिछले एक हफ्ते से रोज 2-3 ट्रैक्टर बैगन आ रही है। किसान नि:शुल्क दे जा रहे हैं। गायों के लिए चारा हो जा रहा है, मगर किसानों का दर्द देखकर दुख होता है।” एफपीओ के जरिए सीधे प्रोसेसिंग यूनिट से जुड़ें किसान
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बिना मांग और आपूर्ति के संतुलन के खेती करना घाटे का सौदा है। “किसानों को एक ही फसल पर निर्भर न रहकर विविधीकरण अपनाना होगा। साथ ही एफपीओ के जरिए सीधे प्रोसेसिंग यूनिट या बड़े बाजारों से जुड़ना होगा,” कृषि अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया। फिलहाल बड़वानी के बैगन उत्पादक किसान सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। किसानों की मांग है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करे या निर्यात को बढ़ावा दे, ताकि उनकी फसल को वाजिब दाम मिल सके। वरना आने वाले सीजन में कोई किसान बैगन बोने की हिम्मत नहीं करेगा।



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