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जमीन के नीचे ट्रेन दौड़ेगी, ऊपर खेत-जंगल सुरक्षित रहेंगे: एमपी की पहली सुरंग, जिसमें बचाव का रास्ता भी; 68 किलोमीटर घटेगी इंदौर-जबलपुर की दूरी – Madhya Pradesh News

जमीन के नीचे ट्रेन दौड़ेगी, ऊपर खेत-जंगल सुरक्षित रहेंगे:  एमपी की पहली सुरंग, जिसमें बचाव का रास्ता भी; 68 किलोमीटर घटेगी इंदौर-जबलपुर की दूरी – Madhya Pradesh News

करीब 7300 करोड़ रुपए की लागत से बन रहे इंदौर-बुधनी रेलवे प्रोजेक्ट में सबसे चुनौतीपूर्ण काम देवास जिले के कमलापुर क्षेत्र में बन रही हाईटेक रेल टनल है। यहां 8.640 किलोमीटर और 1.156 किलोमीटर लंबी दो टनल आधुनिक तकनीक से बनाई जा रही हैं। खास बात यह है कि ये दोनों टनल पूरी तरह ईको फ्रेंडली होंगी। ऊपर खेती होगी, जंगल सुरक्षित रहेंगे और नेशनल हाईवे पर सामान्य यातायात चलता रहेगा जबकि नीचे ट्रेनें दौड़ेंगी। पहली बार इस टनल में इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए अलग एस्केप टनल भी बनाई जा रही है, जो मुख्य टनल के समानांतर चलेगी। इस टनल में क्या नया है और इस रेल प्रोजेक्ट से यात्रियों को क्या फायदा होगा…पढ़िए, रिपोर्ट दोनों टनल को हर 375 मीटर पर एग्जिट पॉइंट से जोड़ा जाएगा इस तरह 205 किलोमीटर लंबे इंदौर-बुधनी रेलवे प्रोजेक्ट में दो बड़ी टनल बनाई जा रही हैं। इसे मध्य भारत की सबसे बड़ी रेल टनल बताया जा रहा है। इतनी लंबी टनल में सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का था। अगर कभी आग, धुआं या अन्य इमरजेंसी स्थिति बने तो यात्रियों को बाहर कैसे निकाला जाएगा? इसका समाधान खोजते हुए मुख्य टनल के समानांतर एक और टनल बनाने का निर्णय लिया गया। इसे ‘एस्केप टनल’ यानी बचाव सुरंग का नाम दिया गया है। मुख्य टनल और एस्केप टनल को हर 375 मीटर पर एग्जिट पॉइंट से जोड़ा जाएगा। किसी भी आपात स्थिति में यात्री इन एग्जिट पॉइंट के जरिए एस्केप टनल तक पहुंच सकेंगे। इसी रास्ते से राहत और बचाव दल भी अंदर पहुंच सकेगा। दिन-रात जुटी टीम, 300 मीटर खुदाई हो चुकी रेलवे लाइन को 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस वजह से टनल निर्माण का काम भी तेज गति से किया जा रहा है। दोनों टनल की खुदाई चार दिशाओं से की जा रही है, ताकि समय कम लगे। टनल निर्माण में करीब 100 इंजीनियर और 500 विशेषज्ञ मजदूर 24 घंटे काम कर रहे हैं। अभी निर्माण शुरुआती चरण में है। मुख्य टनल करीब 300 मीटर और एस्केप टनल लगभग 150 मीटर तक खुद चुकी है। काम की रफ्तार बढ़ाने के लिए तीन किलोमीटर दूर जमीन के भीतर एक अतिरिक्त एडिट टनल भी बनाई जा रही है। यह दोनों टनल के बीच पहुंचेगी, जिससे खुदाई के लिए अतिरिक्त रास्ते खुल जाएंगे और निर्माण की गति तेज होगी। ऑस्ट्रियन तकनीक से बन रही मेन टनल टनल को बनाने में न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (NATM) का उपयोग किया जा रहा है। यह दुनिया की आधुनिक और सुरक्षित टनल निर्माण तकनीकों में शामिल है। इस तकनीक में पहाड़ या मिट्टी की प्राकृतिक मजबूती का उपयोग किया जाता है। पुरानी तकनीकों में खुदाई के साथ भारी कंक्रीट या स्टील सपोर्ट लगाए जाते थे, लेकिन NATM में चट्टानों के व्यवहार को लगातार मॉनिटर किया जाता है और जरूरत के हिसाब से सपोर्ट दिया जाता है। टनल को एक साथ नहीं खोदा जाता। पहले 1 से 3 मीटर तक खुदाई होती है, फिर तुरंत सपोर्ट लगाया जाता है। इससे ढहने का खतरा कम होता है। टनल की खुदाई में सामने आ रही चुनौतियां टनल निर्माण के दौरान कई चुनौतियां सामने आने लगी हैं। खुदाई में कच्चे पत्थर निकल रहे हैं, जो मिट्टी बनकर गिर रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए लोहे की 99 रॉड्स से आर्च बनाया जा रहा है। निर्माण एजेंसी जर्मनी की सेमी ऑटोमैटिक बूमर मशीन और रोबोटिक आर्म का उपयोग कर रही है। इसके बावजूद अभी खुदाई की गति केवल 10 से 15 मीटर प्रतिदिन है। एडिट टनल बनने के बाद यह गति 40 से 50 मीटर प्रतिदिन तक पहुंचने की उम्मीद है। आगे नदी-नाले और कठोर चट्टानों वाला क्षेत्र आने पर पानी रिसने और ब्लास्टिंग जैसी चुनौतियां भी सामने आएंगी। जमीन से 30 मीटर नीचे दौड़ेगी ट्रेन टनल का शुरुआती हिस्सा जमीन से करीब 6 मीटर नीचे है, लेकिन आगे इसकी गहराई 30 मीटर तक पहुंच जाएगी। सबसे खास बात यह है कि इतनी लंबी टनल के ऊपर खेत, घर, जंगल और नया नेशनल हाईवे रहेगा। यानी नीचे ट्रेनें दौड़ेंगी और ऊपर किसान खेती करेंगे और सड़क पर वाहन गुजरते रहेंगे। धनतालाब घाट क्षेत्र के जंगल में हजारों पेड़ हैं। टनल जमीन के भीतर बनने से इन पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसी वजह से इसे ईको फ्रेंडली प्रोजेक्ट भी कहा जा रहा है। सिर्फ 8 मिनट में टनल के पार होगी ट्रेन टनल को 160 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति से चलने वाली ट्रेनों के हिसाब से डिजाइन किया जा रहा है। इसकी अनुमानित उम्र 100 साल बताई जा रही है। मुख्य टनल का व्यास 6.4 मीटर होगा, जबकि एस्केप टनल से जुड़ने वाले रास्तों की लंबाई 17 मीटर और चौड़ाई 2.15 मीटर होगी। रेलवे लाइन बिछने के बाद ट्रेन इस पूरी टनल को करीब 8 मिनट में पार कर सकेगी। टनल बनने से यात्रियों को ये फायदे होंगे इस टनल के बनने से इंदौर से जबलपुर की दूरी 68 किलोमीटर कम हो जाएगी। जबलपुर पहुंचने के लिए नया रूट मिलेगा। इटारसी नहीं जाना पड़ेगा। ये सुरंग मध्य प्रदेश में व्यापार और लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देगी, क्षेत्रीय आर्थिक विकास को गति मिलेगी। अभी इंदौर-जबलपुर की दूरी करीब 554 किमी दूरी है, जो नई लाइन से 486 किमी तक रह जाएगी। करीब एक घंटे तक का समय बचेगा। इसके अलावा उत्तर से दक्षिण की ट्रेनों को भी फायदा होगा। मालगाड़ी, यात्री ट्रेनों के लिए नया रूट तैयार हो जाएगा। दूसरी टनल-2 देवास जिले के ग्राम बागली, कन्नौद तहसील के अंतर्गत कमलापुर, थालघेवारिया और हटनोरा गांवों से होकर गुजरेगी।



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