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कोडरमा की महिलाओं की अनोखी पहल: गोबर से बना रहीं दीये और मूर्तियां, छठ-दीपावली में बाजारों में बढ़ी मांग – koderma News

कोडरमा की महिलाओं की अनोखी पहल:  गोबर से बना रहीं दीये और मूर्तियां, छठ-दीपावली में बाजारों में बढ़ी मांग – koderma News


कोडरमा जिले के सुदूरवर्ती सतगावां प्रखंड के पहलवान आश्रम में इस बार दीपावली और छठ की रौनक कुछ खास है। यहां ग्रामीण महिलाएं गाय के गोबर से दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां और पूजा-सामग्री तैयार कर रही हैं। गोबर क्राफ्ट से बन रहे ये उत्पाद न केवल पर्याव

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गोबर क्राफ्ट से बन रहे ये उत्पाद पर्यावरण के अनुकूल हैं।

गुजरात से मिले प्रशिक्षण का परिणाम दिखा

राष्ट्रीय झारखंड सेवा संस्थान के कोषाध्यक्ष विजय कुमार, नीतू कुमारी और ईशान चंद महतो ने हाल ही में गुजरात के भुज से प्रशिक्षण प्राप्त कर लौटने के बाद इन महिलाओं को गोबर से सजावटी और धार्मिक उत्पाद बनाने की तकनीक सिखाई है। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने दीयों के साथ गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, द्वार झालर, शुभ-लाभ, स्वास्तिक चिन्ह, गुग्गुल कप धूप और ‘शुभ दीपावली’ तथा ‘जय छठी मैया’ जैसे नेम प्लेट तैयार किए हैं।

गोबर और बुरादे से बन रहे इको फ्रैंडली प्रोडक्ट्स

इन उत्पादों को गोबर और लकड़ी के बुरादे के मिश्रण से तैयार किया जाता है। तैयार वस्तुओं को धूप में सुखाने के बाद आकर्षक रंगों से सजाया जाता है, जिससे वे बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं। राष्ट्रीय झारखंड सेवा संस्थान के सचिव मनोज दांगी ने बताया कि धनतेरस से पहले सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

रांची मेले में मिली बड़ी पहचान

हाल ही में रांची में आईएएस ऑफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित दीपावली मेले में इन गोबर उत्पादों को विशेष पहचान मिली। वहां वरिष्ठ अधिकारियों ने इनकी सराहना की और खरीदारी भी की। दांगी ने बताया कि गोबर से बने उत्पाद रेडिएशन से बचाव करते हैं और घरों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। उपयोग के बाद ये मिट्टी में समाहित होकर खाद का रूप ले लेते हैं, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता।

गुजरात के भुज से प्रशिक्षण प्राप्त कर ये महिलाएं प्रोडक्ट बना रही हैं।

गुजरात के भुज से प्रशिक्षण प्राप्त कर ये महिलाएं प्रोडक्ट बना रही हैं।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र से उभर रही नई तस्वीर

सतगावां प्रखंड, जो कभी नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता था, आज महिला सशक्तिकरण, गौसंरक्षण और पर्यावरण बचाव का केंद्र बन गया है। पहलवान आश्रम में चल रहा यह कार्य विकसित भारत के संकल्पों को साकार करने की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण बन रहा है। ग्रामीण महिलाएं अब न केवल आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन चुकी हैं।



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