8 सितंबर 2025, नेपाल में सरकार के खिलाफ जेन जी प्रोटेस्ट शुरू हुआ। अगले ही दिन प्रोटेस्ट हिंसक हो गया। सरकारी इमारतें, होटल और दुकानें प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आ गए। राजधानी काठमांडू में होटल हयात रीजेंसी को भी निशाना बनाया गया। चारों तरफ गोलियों
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इसी होटल में भारत के गाजियाबाद से आए रामबीर सिंह गोला और उनकी पत्नी राजेश देवी रुके थे। दोनों चौथी बार नेपाल तीर्थ करने पहुंचे थे। हर बार दोनों साथ आते और साथ लौटते थे लेकिन इस बार रामबीर सिंह को पत्नी की शव के साथ लौटना पड़ा। क्योंकि हिंसा के दौरान उनकी मौत हो गई।
इन सबके करीब 5 महीने बाद अब 27 जनवरी 2026 को रामबीर सिंह ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की। उन्होंने नेपाल में पत्नी की मौत के लिए इंडियन एंबेसी, भारतीय विदेश मंत्रालय और होटल हयात रीजेंसी को जिम्मेदार बताया है और 100 करोड़ जुर्माने की मांग की है।
रामबीर कहते हैं, ‘स्टाफ ने हमसे कहा था कि हम होटल में पूरी तरह सेफ हैं, लेकिन जब आग लगी तो स्टाफ सबसे पहले भाग गया। इंडियन एंबेसी को घंटों कॉल किया लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। मेरी पत्नी की मौत नेचुरल नहीं, होटल, इंडियन एंबेसी और भारतीय विदेश मंत्रालय की लापरवाही से हुई है।’
9 सितंबर को काठमांडू में प्रदर्शकारी भीड़ ने होटल हयात रीजेंसी के साथ ही होटल हिल्टन में भी आग लगा दी थी।
दैनिक भास्कर की टीम ने रामबीर सिंह गोला से बात कर 9 से 12 सितंबर के बीच उनके साथ बीता घटनाक्रम जाना। साथ ही उनके वकील अभिषेक चौधरी से पूरा केस समझा।
सबसे पहले 18 घंटे होटल में फंसे रहने की कहानी… पत्नी कहती रहीं- चौथी मंजिल से नहीं उतर पाऊंगी, मैंने बोला- साथ घर चलेंगे गाजियाबाद के रहने वाले रामबीर सिंह गोला की कहानी किसी ट्रेजिडी फिल्म से कम नहीं है। वे पूरा घटनाक्रम बताते हुए कहते हैं, ‘7 सितंबर को हम काठमांडू पहुंचे थे। अगले ही दिन 8 सितंबर को नेपाल सरकार के खिलाफ यहां बड़ा जेन जी आंदोलन होने लगा।‘
‘9 सितंबर को हमें काठमांडू से मिथिला के लिए निकलना था। सुबह निकलने की तैयारी भी हो गई थी। तभी पता चला कि प्रदर्शन हिंसक हो गया है। होटल के नीचे प्रदर्शनकारियों ने आग लगानी शुरू कर दी है। होटल स्टाफ ने हमें दूसरी से चौथी फ्लोर पर शिफ्ट कर दिया और भरोसा दिलाया कि यहां हम सेफ हैं। हमें भी लगा था कि 5 स्टार होटल है तो ये बात जिम्मेदारी से कह रहे होंगे।‘
रामबीर आगे बताते हैं, ‘जब हिंसा ज्यादा भड़क गई तो हमने जनरल मैनेजर और दूसरे स्टाफ को ऊपर से आवाज लगाई लेकिन सब गायब थे। होटल का सारा स्टाफ जा चुका था। मैं और मेरी पत्नी दोनों सुबह 9 बजे से होटल के कमरे में बंद थे। हमने मदद के लिए नेपाल में इंडियन एंबेसी को भी 30 से 40 कॉल किए लेकिन फोन नहीं उठा। हम इंतजार कर रहे थे कि शायद कोई बचाने आएगा लेकिन कोई नहीं आया।’
‘हम दोनों पूरे दिन कमरे में ही बंद रहे। क्योंकि चारों तरफ गोलियों की आवाज थी और जगह-जगह आगजनी हो रही थी। शाम करीब 7 बजे हमारे कमरे में दरवाजे के नीचे से धुआं आने लगा और हमारा दम घुटने लगा। अब आग के चलते सीढ़ियों के रास्ते उतरना मुमकिन नहीं था। हमने खिड़की के पर्दे निकाले और रस्सी बनाई। तय किया कि चौथी मंजिल से रस्सी के सहारे नीचे उतर जाएंगे।’
‘हालांकि पत्नी राजी नहीं थी। वे कहती रहीं कि मैं नहीं उतर पाऊंगी। आप चले जाओ, कम से आपकी जान बच जाएगी। हालांकि मैं नहीं माना और कहा- दोनों साथ जाएंगे। रात करीब 8.45 से 9 बजे हम दोनों नीचे भी उतर आए लेकिन पत्नी उतरते वक्त कुछ ऊंचाई से नीचे गिर पड़ी थी। उन्हें पसलियों और सिर पर चोट आई थी लेकिन उस वक्त उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया।

‘अभी सबसे बुरा होना बाकी था, पत्नी भी मुझसे बिछड़ गईं’ रामबीर बताते हैं, ‘जब हम नीचे उतरे तो चारों तरफ आगजनी हो रही थी, गोलियां चल रही थीं। हमें बचाने वाला कोई नहीं था। कई और लोग भी फंसे हुए थे। मिलिट्री की गाड़ियां आते-जाते देखकर हमने उनसे मदद की गुजारिश की लेकिन वो नहीं माने।’
‘बड़ी मुश्किल के बाद मैंने पत्नी को एक गाड़ी पर चढ़ाया लेकिन मैं नहीं चढ़ सका और गाड़ी वहां से निकल गई। अब मैं पत्नी से भी बिछड़ गया था। पूरी रात हिंसा और गोलियों की आवाज के बीच यहां-वहां भटकता रहा। रात करीब 9.30 बजे से लेकर दूसरे दिन दोपहर तक मुझे पता नहीं चल सका कि मेरी पत्नी कहां हैं।’
’10 सितंबर को काफी पूछताछ और खोजबीन के बाद दोपहर करीब 1.45 बजे मुझे पत्नी का क्लू मिला। मिलिट्री के एक अधिकारी ने बताया कि वो काठमांडू के टीचर्स अस्पताल में भर्ती है। उसका इलाज चल रहा है। जब मैं अस्पताल पहुंचा तो उसकी मौत की खबर मिली। मैं भागा-भागा मोर्चरी पहुंचा तो उसकी लाश रखी थी।’

रामबीर कहते हैं कि 9 सितंबर को सुबह से शाम तक हम इंडियन एंबेसी को लगातार कॉल करते रहे लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया।
इंडियन एंबेसी से मदद नहीं मिली, मोटी रकम देकर डेडबॉडी मिली रामबीर कहते हैं, ‘हम 5 स्टार होटल में रुके थे। उम्मीद थी कि यहां सबसे ज्यादा सेफ रहेंगे लेकिन हमारी सेफ्टी की फिक्र किए बिना होटल स्टाफ गायब हो गया। हमने एंबेसी में घंटों कॉल किया लेकिन न फोन उठा और न कॉलबैक आया। क्योंकि एंबेसी से भी सब गायब थे।’
‘अगर इंडियन एंबेसी में हमारा फोन उठा लिया जाता तो पत्नी जिंदा होतीं। हमने यूपी CMO ऑफिस में भी फोन किया था लेकिन वहां से भी मदद नहीं मिली। उसके बाद मुझसे पत्नी के कफन और डेडबॉडी फ्रीजर बॉक्स में रखने के नाम पर भी अनाप-शनाप पैसे वसूले गए। मैंने डेडबॉडी रखने के लिए 25 हजार रु. और पोस्टमार्टम के लिए करीब डेढ़ लाख रु. चुकाए।’
‘फिर 12 सितंबर को मैंने करीब डेढ़-पौने दो लाख रुपए में एंबुलेंस बुक की और अकेले पत्नी का शव लेकर भारत लौटा। लेकिन मेरा सवाल यही है कि आखिर दूसरे देश में हमारी एंबेसी क्यों होती है? क्या हिंसा के वक्त एंबेसी का ऐसे गायब होना भारी लापरवाही नहीं है?’
केस के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘हजार करोड़ भी मिल जाएं तो मेरी पत्नी वापस नहीं आ सकती है। इसलिए बात कंपन्सेशन की नहीं है, बात जिम्मेदारी तय करने की है। हमारी सरकार कहती है कि हम यूक्रेन से अपने लोग निकाल लाए तो फिर नेपाल में वही काम क्यों नहीं किया?’

वकील बोले- बुजुर्ग महिला की मौत सिर्फ लापरवाही का नतीजा केस को लेकर हमने रामबीर सिंह के वकील अभिषेक चौधरी से भी बात की। वे कहते हैं, ‘दुर्भाग्य है कि बुजुर्ग महिला की जान एक ऐसे देश में गई, जहां आप सिर्फ आधार कार्ड लेकर भी जा सकते हैं। वहां वीजा और पासपोर्ट की भी जरूरत नहीं होती। यहां यूपी के गोरखपुर जिले से कुछ घंटों में पहुंचा जा सकता है। फिर भी हमारी सरकार अपने लोगों को नहीं बचा सकी। ये पूरी तरह से लापरवाही का मामला है।’
हमने पूछा कि लापरवाही किसने की? जवाब मिला, ‘काठमांडू में मौजूद इंडियन एंबेसी के एंबेस्डर और को-एंबेस्डर ने की। जिस होटल हयात रीजेंसी में ये लोग ठहरे थे, वो तो जिम्मेदार है ही। बाकी लापरवाही एंबेसी को निर्देश देने वाले विदेश मंत्रालय के संचालक यानी विदेश मंत्री की भी है।’
एडवोकेट चौधरी कहते हैं, ‘हमारी सरकार ने युद्ध के हालात में उन देशों से भी भारतीय स्टूडेंट्स निकाल लिए, जहां पासपोर्ट और वीजा की जरूरत थी। फिर नेपाल तो पड़ोस में था। वहां फ्लाइट भेजने की भी जरूरत नहीं थी।’

हिंसा के बीच एंबेसी का फोन न उठाना, कानून की भाषा में लापरवाही एडवोकेट चौधरी इसे डिटेल में समझाते हुए कहते हैं, ‘मेनका गांधी बनाम यूनियन गवर्नमेंट का एक केस है। इसमें भी वही सवाल था, जो इस केस में है। क्या दूसरे देश में जाने के बाद भी किसी भारतीय नागरिक के राइट टू लाइफ की रक्षा भारत सरकार करेगी? तो उस केस में तय हुआ था कि हां, भारत सरकार का ये कर्तव्य है कि अपने नागरिकों की सुरक्षा सिर्फ देश के अंदर ही नहीं, दूसरे देश में भी करे।’
’केस के फैसले में साफ लिखा है कि दूसरे देशों में एंबेसी बनाई ही इसलिए जाती है कि अपने देश के नागरिकों के हितों और उनकी जान की सुरक्षा कर सकें। एंबेसी को बाकायदा एक जमीन का टुकड़ा दिया जाता है। इस जमीन के टुकड़े पर बनी भारतीय एंबेसी, भारत का ही हिस्सा मानी जाती है, ये भारत का ही प्रतिनिधित्व करती है।’
’इसका काम ही है कि उस देश में पढ़ने, नौकरी करने, घूमने या तीर्थयात्रा करने आए अपने लोगों के अधिकारों और जीवन जीने के अधिकार को सुरक्षित करना।‘
एंबेसी के अफसर बोले- केस के बारे में जानकारी नहीं इस केस को लेकर हमने नेपाल में मौजूद इंडियन एंबेसी का पक्ष जानने के लिए उनरके अफसर बशिष्ठ नंदन से बात की। लापरवाही के आरोप पर उन्होंने कहा कि अभी इस केस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। मीडिया से ही पता चल रहा है। उस वक्त एंबेसी से जो मदद मुमकिन हो सकती थी, वो एंबेसी की तरफ से की गई थी। किसी एक केस के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते।
इसके बाद हमने काठमांडू में मौजूद होटल हयात रीजेंसी से भी कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की। हमने होटल की वेबसाइट पर दिए सभी मोबाइल और फोन नंबरों पर कॉल किया लेकिन सभी बंद मिले।
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