जिला उपभोक्ता आयोग जैसलमेर ने ग्राहकों को लुभावने कूपनों के जाल में फंसाकर डिफेक्टिव सामान का पैसा हड़पने और मनमानी ‘नो रिफंड पॉलिसी’ थोपने पर ‘विशाल मार्ट’ को सेवा दोष का दोषी पाया है। दरअसल, ग्राहक द्वारा डिफेक्टिव सैंडल आ जाने पर मार्ट द्वारा उसको नो रिफंड पॉलिसी में डालने व 562 रुपए रिफंड नहीं देने पर आयोग ने 33,562 का जुर्माना लगाया। पीठ के अध्यक्ष पवन कुमार ओझा ने कंपनी के अड़ियल रवैए पर तल्ख टिप्पणी करते हुए इसे व्यापारिक एकाधिकार और उपभोक्ताओं का मानसिक व आर्थिक शोषण करार दिया। आयोग ने पीड़ित ग्राहक सवाई सिंह के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विशाल मार्ट को 45 दिन की मोहलत दी है; तय समय में भुगतान न करने पर पूरी राशि पर 9% वार्षिक दर से ब्याज भुगतना होगा। यह था पूरा मामला मामले के अनुसार, जैसलमेर शहर के निवासी सवाई सिंह ने गत 31 जनवरी 2026 को विशाल मार्ट के नए खुले मॉल के विज्ञापनों और कूपन योजनाओं से प्रभावित होकर 5,980 रुपए के विभिन्न उत्पादों की खरीदारी की थी। इस खरीदारी में आइटम नंबर 11 के रूप में शामिल एक जोड़ी सैंडल पूरी तरह से डिफेक्टिव (दोषपूर्ण) निकली। उसने तुरंत अगले ही दिन 1 फरवरी 2026 को कंपनी के टोल-फ्री नंबर पर कॉल कर इसकी शिकायत दर्ज कराई और रिटर्न नंबर प्राप्त कर रिफंड ऑर्डर भी जनरेट करवा लिया। इसके बावजूद, कंपनी ने उपभोक्ता को उसके पैसे वापस नहीं लौटाए। जब पीड़ित ने प्रबंधन से संपर्क किया तो कंपनी ने अपनी मनमानी शर्तें थोपते हुए कहा कि उनके यहाँ ‘नो रिफंड पॉलिसी’ लागू है और पैसे के बदले जबरन दूसरा सामान लेने को मजबूर किया गया। मोनोपॉली ऑफ ट्रेड नहीं चलेगा- जज मामले की सुनवाई करते हुए उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष एवं पीठासीन अधिकारी पवन कुमार ओझा तथा सदस्य की पीठ ने कंपनी की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि ग्राहकों पर जबरन ‘नो रिफंड पॉलिसी’ जैसी एकतरफा शर्तें मढ़ना सीधे तौर पर व्यापारिक एकाधिकार (मोनोपॉली ऑफ ट्रेड) चलाना है। यह उपभोक्ताओं का मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शोषण है, जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में गंभीर कमी के दायरे में आता है।
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